सब

समझने की जो बातें थी उन्हें मैं बद समझ बैठा 
जो गिरहन का अँधेरा था उसे मैं शब् समझ बैठा 
पहन कर मुस्कराहट सब यहाँ बाहर निकलते हैं 
मैं बाज़ारू तवज्जोः को लिहा ज़ो दब समझ बैठा 

उन्हें कहना उन्हें सुनना बड़ा पेचीदा लगता है 
के उनकी बात नाहक़ ही मैं कब से सच समझ बैठा 

वो माली का जो बेटा है बड़ा नादान बच्चा है 
जिसे देखा बड़ी गाड़ी में बस साहब समझ बैठा

यही मैं सोचता हूँ के कहाँ और कब समझ बैठा 
बना कर के मशीनें खुद को इंसां रब समझ बैठा  

बड़े नुस्खे नहीं थे ज़िन्दगी में कामयाबी के
बड़ी छोटी सी ख्वाहिश थी जिसे मैं सब समझ बैठा

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